8 जून 2018, असम के कार्बी आंगलोंग जिले में नीलोत्पल दास और अभिजीत नाथ, कांगथिलांगसो पिकनिक स्पॉट से लौट रहे थे। रास्ते में पंजुरी कछारी गांव के पास लगभग 250 लोगों की भीड़ ने उनकी कार रोक ली। भीड़ के हाथों में डंडे, पत्थर और लाठियां थीं और व्हाट्सप्प में एक संदेश: "इलाके में बच्चा-चोर गिरोह सक्रिय है, सावधान रहें।" इस संदेश ने ग्रामीणों के मन में इतना भय और क्रोध भर दिया कि उन्होंने दोनों युवकों को "बच्चा चोर" समझ लिया। नीलोत्पल और अभिजीत ने कहा कि वे असम के ही रहने वाले हैं, घूमने निकले थे, और बच्चा चोर नहीं हैं। वे भीड़ से छोड़ने की गुहार लगाते रहे, लेकिन भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी। भीड़ ने उन्हें कार से बाहर खींचा और लाठियों व पत्थरों से इतनी बुरी तरह पीटा कि दोनों की मौत हो गई। यह घटना भारत में "व्हाट्सऐप लिंचिंग" का सबसे भयावह उदाहरण बन गई। व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के कारण मई से जुलाई 2018 के बीच, भारत में कम से कम 16 लिंचिंग की घटनाएं हुईं, जिनमें 29 लोगों की मौत हुई। यह घटना केवल दो लोगों की मौत की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है जो आज भी हमारे समाज को चुनौती देता है: एक अपुष्ट संदेश, जो मोबाइल की स्क्रीन पर चमकता है, समाज के एक हिस्से को इतना प्रभावित कैसे कर गया कि उसने कानून अपने हाथ में ले लिया? सवाल यह नहीं है कि वह संदेश किसने बनाया था। उससे पहले का सवाल यह है कि एक झूठी सूचना ने इतने लोगों के मन में इतना भय और क्रोध कैसे भर दिया कि वे निर्दोष लोगों को मारने पर उतारू हो गए। यहीं से 4जीडब्लू को समझने का रास्ता खुलता है। 1989 में विलियम एस. लिंड और उनके सहयोगियों ने The Changing Face of War: Into the Fourth Generation में युद्ध की बदलती प्रकृति पर चर्चा करते हुए संकेत दिया था कि भविष्य के संघर्षों में केवल सेनाओं की प्रत्यक्ष भिड़ंत निर्णायक नहीं होगी। राजनीतिक इच्छाशक्ति, समाज की मनोवैज्ञानिक स्थिति, गैर-राजकीय घटक और गैर परंपरागत तरीके भी महत्वपूर्ण होंगे। आज 4जीडब्लू के साथ इनफार्मेशन वारफेयर, साइबर, साइकोलॉजिकल, इन्फ्लुएंस ऑपरेशन्स और हाइब्रिड वारफेयर जैसे कई शब्दों का इस्तेमाल होता है। ये सभी समानार्थी नहीं हैं, लेकिन इनमें एक साझा तत्व दिखाई देता है; प्रतिद्वंद्वी की क्षमता के साथ-साथ उसकी धारणा, विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करना। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि प्रतीक फेक न्यूज़ 4जीडब्लू है या हर सोशल मीडिया पोस्ट किसी विदेशी शक्ति की साजिश है। ऐसी जल्दबाजी स्वयं गलत सूचना का एक रूप बन सकती है। किसी व्यक्ति द्वारा अनजाने में गलत सूचना साझा करना मिसइन्फोर्मशन हो सकता है वहीं किसी को भ्रमित करने के उद्देश्य से जानबूझकर झूठ फैलाना डिसइन्फोर्मशन हो सकता है। किसी राजनीतिक दल का मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास राजनितिक अनुनय हो सकता है। और किसी संगठित समूह द्वारा किसी समाज की कमजोरियों का रणनीतिक लाभ उठाने की कोशिश इन्फ्लुएंस ऑपरेशन हो सकती है। डिजिटल युग ने सूचना को लोकतांत्रिक बना दिया है। आज किसी बड़े मीडिया संस्थान के पास ही सूचना फैलाने की शक्ति नहीं है। एक छात्र, किसान, सैनिक, पत्रकार, इन्फ्लुएंसर या सामान्य नागरिक भी कुछ मिनटों में हजारों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी शक्ति है। आपदा के समय सहायता जुटाने से लेकर भ्रष्टाचार उजागर करने और जनआंदोलन खड़े करने तक सोशल मीडिया ने नागरिकों को अभूतपूर्व आवाज दी है। लेकिन जिस रास्ते से सत्य तेजी से फैलता है, उसी रास्ते से असत्य भी फैल सकता है। यही डिजिटल तंत्र की शक्ति भी है और उसकी समस्या भी। वास्तविक चुनौती केवल यह नहीं है कि लोग झूठी सूचना पर विश्वास कर लेते हैं। उससे बड़ी चुनौती तब पैदा होती है जब सूचना हमारे भीतर मौजूद भय, क्रोध, असुरक्षा या पूर्वाग्रह को छू लेती है। “आपके बच्चे खतरे में हैं”, “वे आपके खिलाफ हैं”,, “किसी संस्था पर भरोसा मत कीजिए” ऐसे संदेश तथ्य से पहले भावना को सक्रिय करते हैं। भावना सक्रिय होते ही सत्यापन पीछे छूट सकता है। फिर एक व्यक्ति दूसरे को भेजता है, दूसरा तीसरे को और थोड़ी देर में संदेश की विश्वसनीयता उसके प्रमाण से नहीं, उसके इंगेजमेंट्स की संख्या से तय होने लगती है। लेकिन हजार लोगों का एक झूठ दोहराना उसे सत्य नहीं बना देता। भारत जैसे विशाल, विविध और लोकतांत्रिक देश में यह विषय और महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारी शक्ति हमारी विविधता में है, लेकिन यही विविधता यदि अविश्वास और शत्रुता में बदल दी जाए तो वह सवेदनशील समस्या बन सकती है। जाति, भाषा, क्षेत्र, विचारधारा, आर्थिक असमानता और राजनीतिक मतभेद हमारे समाज की वास्तविक जटिलताएँ हैं। किसी बाहरी या आंतरिक शक्ति को समाज को प्रभावित करने के लिए हमेशा नया विभाजन पैदा करने की आवश्यकता नहीं होती; कई बार पुराने तनावों को बढ़ा देना ही पर्याप्त होता है। इसलिए 4जीडब्लू को समझने का अर्थ केवल “दुश्मन कौन है?” पूछना नहीं है। उससे पहले यह पूछना है कि “हमारी कमजोरियाँ कहाँ हैं और उन्हें कौन-सी सूचना प्रभावित कर सकती है?” युवा इस बदलती दुनिया के केंद्र में हैं। जिन पीढ़ियों ने इंटरनेट और स्मार्टफोन को जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में स्वीकार किया है, उनके लिए सूचना केवल पढ़ने की चीज नहीं है; वह देखने, सुनने, बनाने, साझा करने और प्रतिक्रिया देने की रोजमर्रा की प्रक्रिया है। इसलिए जेन जी और अल्फ़ा इस सूचना संग्राम की सबसे बड़ी प्रतिरोधक बल भी बन सकते हैं। जिस युवा को यह समझ आ जाए कि वायरल होना और सत्य होना दो अलग बातें हैं, वह केवल स्वयं सुरक्षित नहीं होता; वह अपने परिवार और समाज को भी अधिक सजग बनाता है। इसलिए आज से एक छोटी-सी आदत शुरू की जा सकती है। जब कोई संदेश आपको बहुत डराए, बहुत गुस्सा दिलाए या तुरंत दूसरों तक पहुँचाने के लिए कहे, तो उसे भेजने से पहले कुछ क्षण रुकिए। पूछिए, "यह सूचना आई कहाँ से है? इसकी तारीख क्या है? मूल स्रोत क्या है? क्या किसी विश्वसनीय स्वतंत्र स्रोत ने इसकी पुष्टि की है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या यह मुझे तथ्य दे रही है या मेरी भावना को उत्तेजित कर रही है?" हर बार सही उत्तर मिलना जरूरी नहीं, लेकिन स्वयं से यह प्रश्न पूछना जरूरी है।