सुबह की चाय के साथ फोन उठाते ही हमारे सामने दुनिया खुल जाती है। परिवार के व्हाट्सऐप समूह में कोई संदेश है, यूट्यूब पर कोई वीडियो हमारा इंतजार कर रहा है, इंस्टाग्राम पर एक रील लगातार दूसरी रील से जुड़ रही है, एक्स पर कोई हैसटैग अचानक ट्रेंड कर रहा है और टेलीग्राम पर कोई चैनल “अंदर की खबर” होने का दावा कर रहा है। हम अक्सर सोचते हैं कि हम इन माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन आज एक दूसरा सवाल भी पूछना चाहिए,क्या ये माध्यम हमारी सोच और हमारी पसंद को भी प्रभावित कर रहे हैं?
पिछले स्तंभ में हमने देखा था कि किसी घटना की कहानी किस तरह हमारी धारणा को प्रभावित कर सकती है। इस बार सवाल है कि वह कहानी हमारे पास पहुँचती कैसे है? इसके लिए किसी बंद कमरे में बैठकर कोई एक व्यक्ति हर संदेश लिखे, यह जरूरी नहीं। आधुनिक डिजिटल व्यवस्था में टेक्नोलॉजी, एल्गोरिदम, ऑटोमेटेड अकाउंट्स, इन्फ्लुएंसर्स और सामान्य यूजर मिलकर ऐसा इनफार्मेशन इकोसिस्टम बना सकते हैं, जिसमें कोई विचार बहुत तेजी से फैल सकता है। यह पाँचवीं पीढ़ी के युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। इसके उपकरण हमारे घरों में हैं, हमारी जेब में हैं और हमारी रोजमर्रा की डिजिटल जिंदगी का हिस्सा हैं,व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैट मॉडल भी। यही 5जी युद्ध की बुनियादी विशेषता है, डिजिटल माध्यम से पैदा किया गया प्रभाव अंततः वास्तविक समाज में दिखाई देता है।
फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स ने सूचना को केवल तेज नहीं किया, बल्कि उसे दृश्य, आकर्षक और लगातार उपस्थित रहने वाला बना दिया है। इंस्टाग्राम पर कोई विचार लंबे लेख की तरह नहीं, रील, मीम, संगीत, चित्र या कुछ सेकंड के वीडियो में सामने आता है। युवा उसे राजनीतिक संदेश के बजाय मनोरंजन समझकर देख सकता है, लेकिन बार-बार दोहराया गया मीम या मजाक किसी नेता, समुदाय, विचार या देश के बारे में धारणा बना सकता है। यूट्यूब पर एक वीडियो देखने के बाद उसी विषय से जुड़ी कई सामग्री सामने आती रहती है। इससे व्यक्ति धीरे-धीरे एक विशेष सूचना-इकोसिस्टम में कैद हो जाता है और उसे लगने लगता है कि “हर जगह यही बात हो रही है।” जबकि वह डिजिटल दुनिया के केवल एक हिस्से को देख रहा होता है।
एक्स ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। किसी घटना के कुछ ही मिनटों में हैशटैग, वीडियो, टिप्पणियाँ और उसके पक्ष-विपक्ष के नैरेटिव सामने आ सकते हैं। किसी हैशटैग का ट्रेंड होना अपने-आप में षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है, लेकिन संगठित अकाउंट, बॉट और समन्वित पोस्टिंग किसी नैरेटिव की पहुँच को असामान्य रूप से बढ़ा सकते हैं। यही इन मंचों की असली शक्ति सिर्फ सूचना पहुँचाना नहीं, बल्कि उसे एम्पलीफी , रिपीट और हमारे सूचना-इकोसिस्टम का हिस्सा बनाना। इसलिए 5GW के संदर्भ में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म स्वयं दोषी नहीं, लेकिन इनके नेटवर्क, एल्गोरिद्म और उपयोगकर्ता-समुदाय प्रभाव और सूचना-युद्ध के अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं। प्लेटफार्म भले दोषी हो न हो परन्तु उसके नियंता और उपयोगकर्ता अवश्य इस युद्ध के भागीदार हैं।
व्हाट्सप्प, टेलीग्राम और इसी प्रकार के व्यक्तिगत या परिचित समूह में चर्चा करने वाले ऐप्स की पहुंच लगभग हर परिवार तक है। 140 करोड़ के देश में 85 करोड़ से अधिक यूजर व्हाट्सप्प के हैं। सूचना का पेनिट्रेशन हमारी जनसँख्या में कितन अगहरा है ये इस तथ्य से स्पष्ट है। अपने लोग जब उनकी किसी एक विशेष व्यक्ति, संगठन, विचार या घटना से प्रभावित हो कर या तो उसके पक्ष में बोलते है तो न चाहते हुए भी सामने वाले पर उसके प्रभाव पड़ता है। इस मानवीय स्वाभाव का इस्तेमाल व्हाट्सप्प के माध्यम से मनोवैज्ञानिक युद्ध में किया जाता है। और हम इस युद्ध में है। भरा काइनेटिक युद्ध में, आर्थिक-भूराजनैतिक और सर्कार के स्तर पर मजबूत है तो अभी उसको आतंरिक मोर्चे पर अस्थिर करने के लिए 5जी की रणनीतियां अपनायी जा रही है।
और अब इस पूरी व्यवस्था में सबसे शक्तिशाली नया उपकरण जुड़ गया है,कृत्रिम बुद्धिमत्ता। चैटजीपीटी, जेमिनी जैसे एआई चैट मॉडल और अजेंटिक एआई स्वयं किसी देश के विरुद्ध हथियार नहीं हैं; वे सामान्य प्रयोजन की तकनीक हैं। लेकिन एआई अब किसी अभियान को पहले की तुलना में बहुत अधिक तेजी से सामग्री बनाने में सक्षम कर सकता है,अलग-अलग भाषाओं में संदेश, लक्षित प्रचार सामग्री, नकली प्रोफाइलों के लिए संवाद, वीडियो की पटकथा, चित्र, आवाज और अत्यंत विश्वसनीय दिखने वाली सिंथेटिक सामग्री। यानी जिस काम के लिए पहले दस लोगों और कई दिनों की आवश्यकता होती थी, उसका कुछ हिस्सा अब एक व्यक्ति बहुत कम समय में कर सकता है। यही कारण है कि एआई 5जी युग के सबसे शक्तिशाली संभावित इन्फ्लूएंस टूल्स में गिना जा रहा है।
लेकिन भारत के लिए एक और गंभीर प्रश्न है, क्या बिग टेक कंपनियाँ निष्पक्ष तकनीकी मंच हैं? हाँ या ना? इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। ये कंपनियाँ निजी संस्थाएँ हैं, लेकिन उनका संचालन कानून, नियमन, आर्थिक हित, सुरक्षा चिंताओं और अपने-अपने देशों के जियोपोलिटिकल स्थिति से अलग नहीं है। इसलिए किसी भी देश को अपनी राष्ट्रीय सूचना सुरक्षा केवल इस भरोसे पर नहीं छोड़नी चाहिए कि विदेशी प्लेटफार्म हमेशा उसके हितों के अनुरूप व्यवहार करेंगे। स्मरण रहे भारत को आंतरिक युद्ध या संघर्ष में धकेलने के लिए इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल हो रहा है।
यही 5जी युद्ध की गहराई है। इसमें जरूरी नहीं कि कोई विदेशी सैनिक भारत की सीमा पार करे। हमारे समाज की धारणा, आपसी विश्वास और सूचना-परिसंचरण को प्रभावित करना भी रणनीतिक कदम बन सकता है। लेकिन भारत के लिए इसका उत्तर भय नहीं, तकनीकी आत्मनिर्भरता, मजबूत साइबर क्षमता, पारदर्शी प्लेटफार्म गवर्नेंस, तथ्य-जांच, बहुभाषी डिजिटल साक्षरता और जागरूक नागरिकता होना चाहिए। सबसे जरूरी काम - अपना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स होना। फिर भी, सबसे महत्वपूर्ण हथियार है हमारी प्रतिक्रिया,और सबसे मजबूत कवच है हमारा विवेक। इसलिए आज से एक नियम अपनाइए, फॉरवर्ड करने से पहले पॉज करें। क्योंकि देश की डिजिटल सुरक्षा केवल सरकारों और तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है। भारत के प्रत्येक नागरिक की उंगली जब “शेयर” पर जाती है, उसी क्षण वह इस सूचना-युद्ध का एक छोटा-सा हिस्सा बन जाता है।
